Wednesday, October 21, 2020
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दोनों दंगाई कपिल मिश्रा और ताहिर हुसैन निकले दोस्त

कपिल मिश्रा का आफिस ताहिर हुसैन के घर में हुआ करता था

सोसल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें कपिल मिश्रा और ताहिर हुसैन एक साथ दिखाई दे रही है यह दावा किया जा रहा है कि दोनों एक हि सिक्का के दो पहलू हैं दोनों खास दोस्त बताये जा रहे हैं इससे साफ हो रहा है कि यह दंगा कराया जा रहा है और इसमें राजनीति पार्टियों का बहुत बड़ा हाथ है जिसको समझना आम जनता के लिए बहुत ही जरूरी है नहीं तो इसमें केवल और केवल आम जनता का नुक़सान है।

यही वो कपिल मिश्रा है जो 2017 में नरेंद्र मोदी पर अय्याश होने का आरोप लगाया था और सदन में अय्याश होने का सबूत भी पेश किया था आज वही कपिल मिश्रा बीजेपी के लिए चाहेता कैसे बन गया। बीजेपी दिल्ली पुलिस को फटकार लगाने वाले जज को ट्रास्फर कर सक की दायरे में आ गयी है।
अंकित शर्मा की निर्मम हत्या हुई और मृत देह भी बहुत ही दुःखद स्थिति में बरामद हुई और आप गौर करियेगा, ऐसा होने की खबर से सबसे ज़्यादा खुश सभी सॉफ्ट या हार्डकोर दक्षिणपंथी ही हुए। वे खुश होते दिखेंगे नहीं क्यूंकि ये एक सैडिस्टिक प्लेजर है उनका, जिसमें एक हिंदू मारा जाता है और मुख्य आरोपी मुसलमान बनता है, उस पर भी वो, जो विपक्ष का जीता हुआ नेता है।

ऐसी हत्याएं उनके लिए जस्टिफिकेशन टूल से ज़्यादा कुछ नहीं, जिसके सहारे वे दंगों से ले कर CAA तक सब जस्टिफाई कर जाते हैं। ताहिर हुसैन अगर हैं उसको कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए, न केवल अंकित की हत्या के जिम्मेदार के तौर पर बल्कि दंगा भड़काने और उससे हुए सभी मानवीय / सामाजिक / आर्थिक नुकसानों के लिए भी।

अंकित की हत्या इन दंगों में हुई लगभग 35 मौतों में से एक है और आप खुद से और इन सूचनाओं को लाने वाले सभी लोगों से पूछिये कि बाकी लगभग 34 लोगों में से केवल अंकित का ही नाम पता है बाकी सभी का नाम आपको क्यों नहीं पता है? कौन थे? क्या पेशा था? किसने मारा? कौन है दोषी? किन हालातों में और किस तरह मरे वे? उनके परिवार में कौन है और उनकी क्या हालत है? मैं आपसे कह रहा हूँ, लेकिन एक दो को छोड़कर बाकियों का मुझे भी नहीं पता कि उनकी लाश नाले में चाकुओं से गुदी हुई मिली या उनके अपने ही घर में बच्चों के साथ जल कर अकड़ी हुई हालत में।

हमें बाकियों का क्यूँ नहीं पता? क्या हम मनुष्यों के साथ मृतकों की भी प्रथम / द्वितीय / तृतीय श्रेणी रखने लगे हैं? एक ही हत्या, दूसरे की हत्या से ज्यादा दुःखद है? दंगों को राजनैतिक चूल्हा बोलने वाले हम लोग भी क्या हत्या किये गये लोगों के नाम और ओहदे और सोशल स्टेट्स में अपने चीप थ्रिल और सैडिस्टिक प्लेजर खोजने लगे हैं? क्या आईबी अफसर की हत्या, रिक्शेवाले की हत्या से बड़ी है? शायद है ही, हत्याओं में भी एजेंडा खोजा रहा है और आपको लेंस के सहारे केवल एक ऑब्जेक्ट ही बड़ा कर दिखाया जा रहा है।
मनुष्य शायद सभी जीवों में सबसे अलग इसलिए है कि वो सबसे ज्यादा संवेदनाएँ महसूस कर सकता है और उसी के हिसाब से अपने जीवन और परिवेश को रचता है। पर अब हम संवेदना भी प्री प्रोसेस्ड फ़ूड की तरह स्क्रीन के पीछे लगी फैक्ट्रियों से पा रहे हैं। हम अब ख़ुद अपनी आत्मा से कुछ महसूस नहीं करते, अब हमें कराया जाता है। क्या होना चाहिए मेजॉरिटी की संवेदना, ये प्री-प्रोसेस्ड आता है और इसके बाद भी, हम में से ज्यादातर लोग इस भ्रम में अब भी हैं कि हम अपने अच्छे-बुरे का तय करने भर समझदार और स्वतंत्र हैं। लेकिन न आपके पास चॉइसेज़ हैं और न ही निरपेक्ष सूचना। आपके पास प्रोपेगैंडा के सिवा कुछ नहीं, किसी भी तरफ़ से नहीं।
और हाँ, ग़लत भले ही सब हों, पर कोई भी बराबर ग़लत नहीं होता. जहरीला पानी पिलाने वाला, पानी में ज़हर मिलाने वाले से ज़्यादा ग़लत होता है और उससे भी ज़्यादा गलत वो होता है जो जहर बनाता है।

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My name is Rameshwar Rajbhar Mau utter pradesh

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